परमार्थ निकेतन में सात दिनों से प्रवाहित हो रही श्रीमद् भागवत कथा का भावपूर्ण विराम

परमार्थ निकेतन में सात दिनों से प्रवाहित हो रही श्रीमद् भागवत कथा का भावपूर्ण विराम*

*श्रीमद् कथा मर्मश्र श्री रमेश भाई ओझा जी के श्रीमुख से प्रवाहित हो रही ज्ञान गंगा*

*पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी और डा साध्वी भगवती सरस्वती जी का पावन सान्निध्य*

*हरित कथा, युवा पीढ़ी में संस्कारों का रोपण, पर्यावरण व जल संरक्षण आदि अनेक संकल्पों के साथ श्रीमद् भागवत कथा का समापन*

*परमार्थ निकेतन में आज मातृ दिवस पर गौपूजन कर मातृ शक्ति का किया अभिनन्दन*

*मां गंगा के दिव्य तट पर कथा श्रवण कर गद्गद हुआ यजमान परिवार*

*परमार्थ निकेतन के आध्यात्मिक वातावरण में श्रोताओं को प्राप्त हुआ आत्मिक शान्ति का प्रसाद*

ऋषिकेश, 10 मई। परमार्थ निकेतन में विगत सात दिनों से परम श्रद्धेय श्रीमद् कथा मर्मज्ञ संत श्री रमेश भाई ओझा जी के श्रीमुख से प्रवाहित हो रही श्रीमद् भागवत कथा का आज अत्यंत भावपूर्ण समापन हुआ। माँ गंगा के पावन तट परमार्थ निकेतन में आयोजित इस दिव्य कथा में देश-विदेश से आये श्रद्धालुओं एवं भक्तों ने सहभाग कर आध्यात्मिक ऊर्जा, संस्कारों और आत्मिक शांति का अद्भुत अनुभव किया।

पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी एवं परम श्रद्धेया डॉ. साध्वी भगवती सरस्वती जी के पावन सान्निध्य में सम्पन्न हुई इस कथा में धार्मिक चेतना के साथ मानवता, प्रकृति संरक्षण और संस्कारों के संवर्धन का संदेश पूरे सप्ताह से प्रसारित किया जा रहा है।

कथा के समापन अवसर पर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि आज के समय में युवा पीढ़ी को भारतीय संस्कृति और सनातन मूल्यों से जोड़ना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

पूज्य स्वामी जी ने आज मातृ दिवस है के अवसर पर कहा कि वैसे तो हर दिन, हर क्षण, हर पल ही मातृ शक्ति को समर्पित है। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥ आज हम उन पाँच माताओं का वंदन करें, जिनसे हमारा अस्तित्व है, हमें जीवन मिला, संस्कार प्राप्त हुये और हमारे जीवन को दिशा मिली। वह जननी, जिसने हमें अपने अन्न से पोषित किया, अपनी ममता से सींचा, अपने आँचल में सुरक्षा दी और अपने आशीर्वाद से हर तूफान में हमें संभाला। जब जब हमें जरूरत पड़ी, माँ ने हमें सम्भाला, जब हम डरे, माँ ने साहस दिया, जब हम भटके, माँ ने मार्ग दिखाया।

पूज्य स्वामी जी ने कहा कि माँ सिर्फ एक शब्द नहीं, वह ईश्वर के प्रेम का सजीव स्वरूप है। हमारी मातृभूमि भारत माता, जिनकी मिट्टी में बलिदानों की सुगंध है, जिनकी धरा ऋषियों की तपोभूमि, वीरों की कर्मभूमि और संतों की ज्ञानभूमि रही है। यह भूमि हमें, हमारी पहचान देती है। धरती माता, जो बिना भेदभाव हमें अन्न देती है, फल देती है, औषधि देती है और अपने धैर्य से सेवा का पाठ पढ़ाती है। इसलिये हम जितना लेते हैं, उससे अधिक लौटाना भी सीखें। माँ गंगा, जिनकी धाराओं में जल ही नहीं, युगों की संस्कृति प्रवाहित होती है। जिनके तटों पर सभ्यताओं ने साँस ली, यह 25 सौ 25 किलोमीटर का चलता फिरता मन्दिर हमें जीवन, जीविका और मोक्ष प्रदान करता है।

हमारी मातृभाषा, जिससे निकला हमारा पहला शब्द, जिसने हमने हँसना सीखा, अपने भावों को अभिव्यक्त करना सीखा, प्रेम जताना सीखा। अपनी भाषा से दूर होना अर्थात् अपनी जड़ों से दूर होना है। जिस दिन भारत का युवा इन पाँच माताओं का महत्व समझ लेगा, उस दिन भारत पुनः विश्व गुरू की ओर अग्रसर होगा।

डॉ. साध्वी भगवती सरस्वती जी ने कहा कि जब हम कथा श्रवण करते हैं तो हमारे भीतर सकारात्मक ऊर्जा, आत्मिक शांति और ईश्वर के प्रति समर्पण का भाव जागृत होता है।

इस सात दिवसीय कथा के माध्यम से हरित कथा, पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण एवं स्वच्छता जैसे अनेक महत्वपूर्ण संकल्प भी लिये गये। श्रद्धालुओं को पौधारोपण, प्लास्टिक मुक्त जीवनशैली अपनाने और जल बचाने के लिये प्रेरित किया गया। पूज्य स्वामी जी ने कहा कि माँ गंगा की निर्मलता और प्रकृति का संरक्षण केवल एक अभियान नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी है।

आज मातृ दिवस के अवसर पर पूज्य स्वामी जी ने गौपूजन किया। गौमाता की पूजा कर मातृ शक्ति का अभिनन्दन किया गया तथा

माँ गंगा के दिव्य तट परमार्थ निकेतन में कथा श्रवण कर यजमान परिवार एवं श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। यह सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक चेतना, पर्यावरण संरक्षण और मानव मूल्यों को पुनर्जीवित करने का एक दिव्य अवसर है।

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