बढ़ती गर्मी में परमार्थ निकेतन से मानवता का संदेश

बढ़ती गर्मी में परमार्थ निकेतन से मानवता का संदेश
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने शिक्षकों को जल सेवा के माध्यम से जीवन व जीवों की रक्षा हेतु किया प्रेरित

ऋषिकेश, 27 मई। भीषण गर्मी और लगातार बढ़ते तापमान के बीच पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने मानवता, सेवा और संवेदनशीलता का अद्भुत संदेश देते हुए परमार्थ निकेतन द्वारा संचालित सभी विद्यालयों के शिक्षकों को प्रेरित किया कि वे जल सेवा के माध्यम से राहत पहुँचाने का कार्य करें। वर्तमान समय में स्वयं को गर्मी से सुरक्षित रखने के साथ ही समाज, पशु-पक्षियों और प्रत्येक जीव के प्रति करुणा का भाव भी बहुत जरूरी है।
वर्तमान समय में तापमान निरंतर बढ़ता जा रहा है। भीषण गर्मी के कारण अनेक लोग, विशेषकर तीर्थ यात्री, गरीब, मजदूर, राहगीर, वृद्धजन और छोटे बच्चे गंभीर कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। ऐसे समय में यदि हम किसी प्यासे व्यक्ति को एक गिलास पानी भी उपलब्ध करा दें तो वह केवल पानी नहीं, बल्कि मानवता का अमृत होगा।
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने शिक्षकों को प्रेरित करते हुए कहा गया कि वे अपने घरों, विद्यालयों, दुकानों तथा सार्वजनिक स्थानों के बाहर मिट्टी के मटकों में स्वच्छ और शीतल जल की व्यवस्था करें ताकि राह चलते लोग अपनी प्यास बुझा सकें। यह केवल सेवा नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति की वह सनातन परंपरा है जिसमें “नर सेवा ही नारायण सेवा” है।
वर्तमान समय में केवल मनुष्यों की ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों की पीड़ा को भी समझना आवश्यक है। प्रचंड गर्मी के कारण अनेक पक्षी पानी के अभाव में तड़पते हैं और कई बार उनकी मृत्यु तक हो जाती है। ऐसे में यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने घर, बालकनी, छत, दुकान या कार्यालय के बाहर पानी से भरा एक छोटा-सा पात्र रख दे, तो वह किसी पक्षी के लिए जीवनदान बन सकता है।
पूज्य स्वामी जी ने शिक्षकों से आह्वान किया कि वे इस संदेश को केवल अपने तक सीमित न रखें बल्कि विद्यार्थियों और समाज के बीच भी जागरूकता फैलाएँ। बच्चों में सेवा, करुणा और प्रकृति संरक्षण के संस्कार विकसित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। जब नई पीढ़ी जल संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण और जीवों के प्रति संवेदनशील बनेगी, तभी समाज में वास्तविक परिवर्तन आएगा।

पूज्य स्वामी जी ने कहा कि भारतीय संस्कृति सदैव प्रकृति के साथ सामंजस्य और सह-अस्तित्व की भावना को बढ़ावा देती रही है। हमारे ऋषि-मुनियों ने जल को जीवन का आधार माना है। आज जब पृथ्वी जल संकट और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है, तब जल सेवा केवल पुण्य का कार्य नहीं बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व भी है।
गर्मी के इन कठिन दिनों में हमें विशेष सावधानी बरतनी होगी, अनावश्यक रूप से धूप में निकलने से बचें, अधिक पानी पिएँ, पौष्टिक आहार लें और अपने आसपास के लोगों का भी ध्यान रखें। यदि कोई व्यक्ति अस्वस्थ दिखाई दे तो उसकी सहायता के लिए आगे आएँ। यही सच्ची मानवता है।
शिक्षकों ने अपने-अपने क्षेत्रों में जल सेवा अभियान चलाने का संकल्प लिया। एक छोटा-सा प्रयास, एक घड़ा पानी, एक पात्र जल और एक करुणामयी भावना अनेक जीवनों को राहत और आशा दे सकती है। आइए, इस भीषण गर्मी में हम सभी सेवा, संवेदना और करुणा का दीप प्रज्वलित करें। किसी प्यासे को पानी पिलाएँ, पशु-पक्षियों के लिए जल रखें और मानवता को जीवित रखने का संकल्प लें। यही भारतीय संस्कृति का संदेश है और यही सच्चा धर्म भी।

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