अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस पर विश्व ने अपनाया भारत का योग-संदेश

*💥अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस पर विश्व ने अपनाया भारत का योग-संदेश*

*💐25 से अधिक देशों के राजदूत, हाईकमिश्नर एवं उच्चाधिकारी भारत की प्राचीन योग परम्परा, सनातन संस्कृति के ज्ञान और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के संदेश के साथ लौटे*

*💥परमार्थ निकेतन से नेपाल और इक्वाडोर ने ‘गंगा योग’ हेतु किया ऐतिहासिक एमओयू*

*✨माँ गंगा की गोद में योग का अलौकिक अनुभव बना वैश्विक एकता, शांति और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक*

ऋषिकेश, 22 जून। 12 वें अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस के पावन अवसर पर विश्व ने पुनः भारत की सनातन संस्कृति, योग विज्ञान और आध्यात्मिक चेतना की विराटता का साक्षात्कार किया। हिमालय की दिव्य ऊर्जा और माँ गंगा के पावन तट पर स्थित परमार्थ निकेतन में आयोजित भव्य योग समारोह में 25 से अधिक देशों के राजदूतों, हाईकमिश्नर, उच्चाधिकरियों तथा अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों ने सहभागिता कर योग को केवल शारीरिक अभ्यास नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता को जोड़ने वाला वैश्विक जीवन-दर्शन बताया।

अनेक देशों से आये विदेशी प्रतिनिधियों ने कहा कि “परमार्थ निकेतन माँ गंगा की गोद में बैठकर योग करने का आनंद शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। यह केवल एक अभ्यास नहीं, बल्कि स्वयं से जुड़ने का दिव्य अनुभव है।”

प्रस्थान से पूर्व 25 से अधिक देशों के राजदूतों, हाईकमिश्नर, उच्चाधिकरियों तथा अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों को परमार्थ निकेतन की ओर से हरित भेंट स्वरूप रुद्राक्ष के पौधे प्रदान किए गए, ताकि वे अपनी-अपनी एम्बेसी में उनका रोपण कर ’एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान को वैश्विक स्वरूप दें। यह केवल एक पौधा नहीं, बल्कि माँ प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, पर्यावरण संरक्षण और विश्वव्यापी हरित भविष्य का जीवंत संकल्प है।

इस अवसर पर भारत की उस सनातन परम्परा पर भी चिंतन हुआ जो हजारों वर्षों से सम्पूर्ण विश्व को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ अर्थात् पूरा विश्व एक परिवार है का संदेश देती आई है। योग ने एक बार फिर सिद्ध किया कि भाषा, संस्कृति, सीमाएँ और राष्ट्र अलग हो सकते हैं, किन्तु मानवता का मूल भाव एक ही है। योग इसी एकत्व का विज्ञान है।

कार्यक्रम के दौरान परमार्थ निकेतन ने वैश्विक स्तर पर योग के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए नेपाल एवं इक्वाडोर के साथ ‘गंगा योग’ को बढ़ावा देने हेतु ऐतिहासिक समझौता (एमओयू) किया। यह पहल केवल संस्थागत सहयोग नहीं, बल्कि योग, भारतीय संस्कृति और वैश्विक कल्याण के साझा संकल्प का प्रतीक है। इस सहयोग के माध्यम से योग को विश्व के अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने, के साथ संतुलित जीवनशैली को प्रोत्साहित करने की दिशा में संयुक्त प्रयास है।

पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि अनेक देश, अनेक संस्कृतियाँ, पर संकल्प एक-योगमय, शांतिमय और समरस विश्व। अनेक भाषाएँ, अनेक परम्पराएँ, पर चेतना एक है और वह है सनातन की।

योग के सूत्र में बंधकर विश्व ने एक स्वर में उद्घोष किया कि मानवता का भविष्य संघर्ष से नहीं, संस्कृति से; विभाजन से नहीं, वसुधैव कुटुम्बकम् से; और शक्ति से नहीं, शाश्वत योग से सुरक्षित होगा। भारत की सनातन ज्ञानधारा आज विश्व को केवल स्वस्थ जीवन का मार्ग नहीं, बल्कि वैश्विक शांति, सद्भाव, पर्यावरण संरक्षण और आध्यात्मिक उत्कर्ष का अमर पथ दिखा रही है। योग ही वह सेतु है, जो राष्ट्रों को नहीं, हृदयों को जोड़ता है; सीमाओं को नहीं, सम्पूर्ण मानवता को एक परिवार बनाता है।

परमार्थ निकेतन वर्षों से योग को जीवन जीने की कला तथा विश्व शांति के माध्यम के रूप में स्थापित करने के लिए निरंतर कार्य कर रहा है। आज विश्व के अनेक देशों में योग के प्रति बढ़ती आस्था इस बात का प्रमाण है कि आधुनिक जीवन की चुनौतियों का समाधान भारत के प्राचीन ज्ञान में निहित है। तनाव, अवसाद, असंतुलित जीवनशैली और पर्यावरणीय संकट जैसे वैश्विक विषयों के समाधान में योग, ध्यान और आध्यात्मिक मूल्यों की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर परमार्थ निकेतन में विभिन्न देशों के प्रतिनिधि अपने साथ केवल योगासन की तकनीक ही नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन, करुणा, सह-अस्तित्व, प्रकृति के प्रति सम्मान और वैश्विक बंधुत्व का संदेश भी लेकर लौटे। यह आयोजन विश्व को यह स्मरण कराता है कि भारत केवल योग की जन्मभूमि ही नहीं, बल्कि मानवता को शांति, संतुलन और आध्यात्मिक दिशा प्रदान करने वाली विश्वगुरु परम्परा का संवाहक है।

माँ गंगा के तट पर सम्पन्न यह दिव्य आयोजन इस सत्य का उद्घोष है कि योग किसी एक धर्म, समुदाय अथवा देश की सीमा में बंधा नहीं है। योग सम्पूर्ण मानवता की साझा धरोहर है, जो शरीर को स्वास्थ्य, मन को शांति, बुद्धि को स्पष्टता और आत्मा को परम चेतना से जोड़ता है। जब विश्व के विभिन्न देशों के प्रतिनिधि एक साथ योगासन में बैठे, तब यह दृश्य वास्तव में ‘एक पृथ्वी, एक परिवार और एक भविष्य’ की भावना का सजीव स्वरूप बन गया।

परमार्थ निकेतन से उठी यह योग चेतना अब सीमाओं से परे विश्व के अनेक देशों तक पहुँचेगी। नेपाल और इक्वाडोर के साथ हुए ‘गंगा योग’ एमओयू ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत का योग और सनातन संस्कृति आज वैश्विक सहयोग, पर्यावरण संरक्षण, आध्यात्मिक जागरण और मानव कल्याण की नई दिशा तय कर रहे हैं। यह आयोजन केवल अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस का उत्सव नहीं था, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए स्वास्थ्य, सद्भाव, शांति और आध्यात्मिक उत्थान का एक ऐतिहासिक संकल्प बन गया।

राजदूत, हाईकमिश्नर एवं उच्चाधिकारी सभी की परमार्थ निकेतन से विदाई के समय अतिथि देवों भव की भारतीय परम्परा के अनुरूप पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी और साध्वी भगवती सरस्वती जी ने रूद्राक्ष की माला और पगड़ी पहनाकर उनका अभिनन्दन किया। सभी बहुत ही प्रसन्न हुये

राजदूतों, हाईकमिश्नर एवं वरिष्ठ अधिकारियों ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि परमार्थ निकेतन में माँ गंगा के पावन तट पर योग, ध्यान और आध्यात्मिक वातावरण का अनुभव अत्यंत प्रेरणादायी एवं अविस्मरणीय रहा। उन्होंने इसे भारत की सनातन संस्कृति, मानवीय मूल्यों और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की जीवंत अभिव्यक्ति बताया तथा विश्वास व्यक्त किया कि यह अनुभव उनके देशों में शांति, सद्भाव, योग और पर्यावरण संरक्षण के संदेश को नई ऊर्जा प्रदान करेगा।

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